वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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अभिषेक


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अवसरवादी राजनीति

Posted On: 19 Apr, 2015  
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social issues में

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किसान का दर्द

Posted On: 13 Apr, 2015  
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Junction Forum social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अनोखा चित्रकार

Posted On: 7 Apr, 2015  
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Hindi Sahitya में

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ये कैसा धंधा है?

Posted On: 31 Mar, 2015  
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Junction Forum Others social issues में

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समान सिविल संहिता:राष्ट्र की आवश्यकता

Posted On: 26 Mar, 2015  
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social issues में

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एक पगली लड़की

Posted On: 15 Mar, 2015  
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Hindi Sahitya social issues कविता में

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बालश्रम और अभिजात वर्ग

Posted On: 28 Jan, 2015  
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Others Politics social issues में

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घर याद आता है मुझे

Posted On: 3 Jan, 2015  
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Celebrity Writer कविता में

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जम्मू और कश्मीर;(अपने या बेगाने)

Posted On: 17 Dec, 2014  
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Junction Forum social issues में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एक लेखक पत्रकार का शस्त्र है लेखन. उसे अपने शस्त्र का उपयोग अशक्तों की रक्षा के लिए करनी चाहिए ...वही आप कर रहे हैं... लोग आंख मूंदकर सत्य को देखना नहीं कहते. इन किसानों के वजन से भी लोगों को चिढ है, ये वामपंथी किसान हैं किसी के भड़कावे में आकर मोदी के खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं.. ऐसी अफवाहें भी उड़ाई जा रही है. इन लोगों को अच्छा खाना कहते हुए भी चित्र सोसल मीडिया पर आ गए हैं. ... वे जो चाहेंगे वही होगा. कल को लाठी चार्ज हो जाय तो भी आश्चर्य करने की जरूरत नहीं. ये अभी वोबनक नहीं बने हैं. वोट बैंक बनेंगे तब ही कुछ किया जा सकता है अन्यथा मीडिया भी इन्हे भाव नहीं दे रहा... मीडिया को केजरीवाल का प्लेट दिखता है उसकी कीमत भी दिखती है ...इन किसानों की दुर्दशा नहीं दिखती. पर आप जैसे युवा पत्रकार हैं जिनमे अभी जोश जज्बा है. लिखिए ... कलम की धार को तेज कीजिये. सर्वे सुखिन: भवन्तु.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: अभिषेक शुक्ल अभिषेक शुक्ल

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किसी भी पार्टी या न्यूज़ चैनल वालों के बहस का विषय गरीबी,बेरोजगारी, भूखमरी, बीमारी, भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि मोहन भागवत, आदित्यनाथ, ओवैसी या दो चार और चिरकुट नेताओं ने क्या बयान दिए, कौन भारत माँ की जय नहीं बोला , कौन बोल रहा है या कौन नहीं बोलेगा? ये बहस का विषय है. बहुत ही सुन्दर अभिषेक जी, आज ब्यर्थ के मुद्दे को ही उछाला जा रहा है. मैंने पहले भी लिखा था कन्हैया, या रोहित वेमुला को ज्यादा मीडिया दवरा या कुछ चिरकुट नेताओं दवरा ज्यादा तूल दिया गया उसका परिणाम आज हर जगह, आक्रोश, हिंसा आदि की बदतर स्थिति होती जा रही है. प्रत्युषा बनर्जी की एटीएम हत्या पर जितनी कवरेज हुई किसी किसान की आत्म हत्या या शहीदों को भी तरजीह नहीं दी जाती. आपका लेखन संतुलित और चिंतन करने योग्य है. अपना विचार अवश्य प्रकट करें!

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वह व्यक्ति पुरुष नहीं हो सकता जो नारी पर अत्याचार होने दे या खुद करें, हैवानों से दो हाथ करो चुप मत बैठो, कहीं ऐसा न हो कि पैशाचिकता इस हद तक रक्त में समाहित हो जाए कि रक्त संबंधों में भी शुचिता का ख्याल न रहे, क्योंकि एक बार जिसके सर पर हैवानियत चढ़ती है उसे किसी रिश्ते का ख्याल नहीं होता भले ही रिश्ता चाहे माँ का हो या बहन का, हैवानियत से जंग लड़ने का वक्त है न की चुप बैठने का, इससे पहले की हर गली-मोहल्ले में दामिनी काण्ड दुहराया जाए लोगों का जागना जरूरी है..सिर्फ जागना ही नहीं है एक जुट होकर लड़ना भी है अन्यथा भारतीय संस्कृति जिसका हम दम्भ भरते हैं को ग्लानि में बदलते देर नहीं लगेगी. सहमत हूँ आपसे आपने ज्वलंत विषय उठाया है ...साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई!

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बहुत अच्छा लिखा है तुमने अभिषेक --कहना यही है की प्रश्न तो उठाए तुमने पर जवाब नही दिये उंगली तो सब पर उठाई मगर जनता को तो कोई चाहिए --कौन ?अपनी राय नही दी --एक नारा उठा एक बार "गरीबी हटाओ"  कौन हटाएगा, कैसे हटेगी कोई जवाब नही। हटाने वाले चले गए ,गरीबी जहां की तहां है; अब अरविंद जी ले के आए हैं- भ्रष्टाचार हटाओ /हटाएँगे ---कैसे? कोई खाका है दिमाग में या वैसे ही हटाएँगे जैसे दिल्ली में हटाया है --जहां भ्रष्टाचार आपके रक्त मांस में समाया हुआ है वहाँ उस से लड़ने के हथियार बदल जाते हैं सबसे एक साथ लड़ने की ठान लोगे तो तुम्हारे साथ कौन खड़ा होगा सभी तो भ्रष्ट हैं ऊपर सत्ता के गलियारे से ले कर नीचे के सबसे छोटी पायदान पर खड़े आम आदमी तक, बीच का रास्ता निकालना नही आएगा तो उसकी परिनिति वही होगी जो हम देख चुके है;पहले भी और देश की अर्थ व्यवस्था ,सैन्य सुरक्षा ,विदेश नीतियाँ कुछ भी अब एक और नक्कारा और अक्षम प्रधान मंत्री या भगोड़े को नही झेल सकता ;थोड़े भ्रष्ट,थोड़े निरंकुश लेकिन प्रोग्रेससिव प्रधान मंत्री को जरूर झे ल सकते हैं --सहर्ष

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हम पश्चिम को अकारण ही व्यभिचार और वासना का जनक कहते हैं, कम से कम वो जो करते हैं उनके जीवन का सामान्य हिस्सा है पर हम वासना और व्यभिचार ढ़ोते हैं और तर्क देते हैं अपने गौरव शाली अतीत का, जिन्हें हम कब का रौंद चुके हैं. २१ साल कि युवती हो या ५ साल कि छोटी बच्ची, हमारे यहाँ कोई सुरक्षित नहीं है. हम कितने गर्व से कहते हैं कि सबसे पुरानी सभ्यता हमारी है, ये क्यों नहीं कहते कि वो पुरानी सभ्यता अब असभ्यता में बदल गयी है, कोई थोडा भी जागरूक विदेशी हो तो हमसे यही कहेगा कि तुम उसी भारत के हो जहाँ बलात्कार नियमित होते हैं और जनता तमाशा देखती है, और बलात्कार होने के बाद सरकार पर गुस्सा जाहिर करती है, पर बदलाव का कोई वादा नहीं खुद से करती है. ”निकम्मी जनता-निकम्मी सरकार”. सार्थक सवाल उठाये हैं आपने अपने लेखन में

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शुक्ल जी बड़े क़ायदे से समझाने का प्रयास किया है, बधाई ! हम, आप, लोग, सब भागे जा रहे हैं, पर पता नहीं किसी को कि किस रास्ते पर । बस भागे जा रहे हैं । रास्ते में जो मिल जाता है, खा लेते हैं । जब कंठ सूख कर गड़ने लगता है, तब होश आता है कि पता नहीं कब से बड़े ज़ोरों की प्यास लगी है । सामने जैसा भी पानी मिलता है, पी लेते हैं । मिनरल वाटर है, तो किसी भी कीमत पर उसी समय खरीदते हैं । कुछ नहीं, तो कोल्ड ड्रिंक चलेगा कोई सा भी । वह भी नहीं, तो बीयर से ही बुझा लेते हैं । सेक्स की प्यास बुझाने के मामले में भी कुछ ऐसा ही पागलपन सवार होता जा रहा है । अब अभिसार की कोई भावना नहीं रही, मर चुकी है । बस सूखी प्यास है आदमज़ात, जिसे किसी तरह बुझा लेना है बस । जब भावनाएं पैदा ही नहीं हो पातीं, तो ऊँच-नीच, बच्ची-वयस्क, या रिश्ते-नातों का भेद भी मिटना ही है । वही हो रहा है । निरन्तर दौड़ते-हाँफ़ते कभी तो रुक कर देखना ही पड़ेगा कि क्या हम अब वास्तव में सभ्य कहे जा सकने वाले समाज का ही एक अंग हैं, या समाज ही बदल चुका है ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

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