वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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अंधा रेस

Posted On: 21 Mar, 2017 Social Issues में

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इन दिनों रेस लगी है। ये रेस आम नहीं है। इसमें जीतने के लिए आपसे कहा जाएगा कि दौड़िए मग़र टूटे हुए पैरों के साथ।आपको भगाया जाएगा पर पैर काट कर। आपको घिसटने के लिए भी कहा जाएगा लेकिन हाथों में पड़े छाले ऐसा कुछ करने के लिए आपको इजाज़त नहीं देंगे।
कंपटीशन है बॅास लोग मारकर आपको ज़िन्दा रखना चाहते हैं।
लिखवाया आपसे जाएगा पर शब्द उनके रहेंगे। बुलवाया आपसे जाएगा लेकिन वही जो उनके कान सुनना चाहें । चीखने के लिए भी कहा जाएगा लेकिन साउंडप्रूफ़ कमरे में जहां आपकी आवाज़ शोर में तब्दील होकर आपके कानों के पर्दे फाड़ दे और आप कभी सुन ना पाएँ।
ये बाज़ार है। यहां आपकी मौलिकता को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां आने के लिए या तो आप ख़ुद को बदल लें या कंपटीशन ही छोड़ दें।
आपकी बोली लगाई जाती है। मोल-भाव होता है। आप अगर दुधारू निकले तो बिकेंगे वरना बांझ बैल को कोई नहीं ख़रीदता। यहां ऐसी मशीनें लगाई गईं हैं जो बैल से भी दूध निकाल लेतीं हैं। बैल बनिये शायद क़ीमत लग जाए।
जिस लीक पर चलने की आदत आपकी है, जिसे आपने तलाशा और तराशा है, जिसकी वज़ह से आपकी पहचान है, उससे लगाव होना स्वाभाविक है। उस लीक से अलग हट कर चलना हर मज़हब के ख़ुदा की नज़रों में गुनाह है।
अपनी मौलिकता का दम घोंट कर कुछ हासिल करना ख़ुद को मारकर ज़िन्दगी तलाशने जैसा है। भूत बनकर जीना इंसानियत के लिहाज़ से ठीक नहीं है।
किसी के डिमांड पर बदल जाना और ख़ुद को वैसा ही तैयार करना जैसा कोई चाहता है, अपनी जड़ों में तेज़ाब डालने जैसा है। जिस दिन इनका मक़सद पूरा हुआ मैंगोफ़्रूटी के बोतल की तरह निचोड़ कर फेंक देंगे ये लोग।
पिचका हुआ डिब्बा बनकर डस्टबिन में जाने से अच्छा है शीशे का बोतल बनकर चकनाचूर हो जाना। कोई पैरों से रौंदना भी चाहे तो चुभने के डर ऐसा न कर पाए।
अपनी मौलिकता के लिए शहीद हो जाना अच्छा है, टूट जाना बेहतर है लेकिन पहचान खो कर सुरक्षित रहना नहीं।
ख़ुद को संवारना है, निखारना है, चमकाना है लेकिन खोना नहीं है। बहुत प्यार है ख़ुद से। बदल गया तो बेवफ़ाई हो जाएगी अपने आपसे। ख़ुद से बेवफ़ाई करने की हिम्मत अभी नहीं है ।
कभी होगी भी नहीं।
इंसान होने का कुछ तो घाटा होना चाहिए, रोबोट तो हूँ नहीं जो प्रोग्रामिंग से चलूँगा…कुछ डीएनए में ही खोट है…
कानून पढ़ते-पढ़ते भारत के संविधान की तरह रिजिड हो गया हूँ, जीवन के कुछ अनुच्छेदों को लेकर। फ्लेक्सीबिलटी तो रूठ के चली ही गई है..सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दिल ने अप्रूवल दे दिया है, जिसके कारण i can’t amend the basic structure of my life.
अब जैसा भी हूं, जितना भी हूं, ऐसा ही हूं…बदल गया तो शायद ख़ुद की नज़रों में गिर जाऊंगा जो मैं हरगिज़ नहीं चाहता।
- अभिषेक शुक्ल



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