वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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‘आज़ादी और आदिवासी’

Posted On 1 Oct, 2016 Social Issues में

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बीते सप्ताह एक किताब हाथ लगी ”आज़ादी और आदिवासी”।
इस किताब के लेखक हैं पत्रकार अमरेंद्र किशोर। प्रकृति पुत्रों की बनैली संस्कृति और उनके भाग्य में मढ़ी गयी विसंगति तथा समाज के साथ उनके संघर्ष पर अब तक लिखी गई सबसे सटीक किताबों में से एक किताब आज़ादी और आदिवासी भी है।
आम तौर पर जब हम आंकड़े इकट्ठा करने के लिए कोई किताब पढ़ते हैं तो अपने काम का विषय पढ़ कर किताब वापस लाइब्रेरी में रख देते हैं, ऐसे ही मंशा लिए मैं भी पढ़ने गया था पर एक लाइन ने पूरी किताब पढ़ा डाली मुझसे।
वो लाइन थी-
”कोई भी समूह जब अपने मूल से कटता है तो कई प्रकार की विसंगतियां उसके भाग्य में मढ़ जाती हैं।” ये सच है।
हर समुदाय का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है जिसमें किसी भी प्रकार का बाह्य हस्तक्षेप करने का अर्थ होता है उस समुदाय की मान्यताओं को ठेस पहुँचाना। कई बार हस्तक्षेप इतना घातक होता है कि लोग विद्रोह कर देते हैं समाज के प्रति|यह विद्रोह इतना घातक होता है कि समाज सशस्त्र क्रांति की ओर बढ़ जाता है। विद्रोह धीरे-धीरे वाद में बदल जाता है और फिर उस वाद का नामकरण कर दिया जाता है, जैसे – नक्सलवाद, माओवाद, जंगलवाद।
फिर शुरू होता है राज्य का अत्याचार उस समाज पर कालांतर में राज्य और समुदाय एक-दुसरे से उलझते रहते हैं.
जंगल कटते जा रहे हैं और इन जंगलों में रहने वाले आदिवासी भी अपने जड़ों से कटते जा रहे हैं, जिस के कारण एक बड़ा तबका असन्तुष्ट है।
सरकार से असंतुष्ट लोगों को विद्रोही बनाना सबसे आसान काम होता है, उनके इसी मनः स्थिति का लाभ उठाने में चालाकी दिखाई नक्सलवादी संगठनों ने।
आदिवासी समाज का अस्तित्व जंगलों से है। आदिवासियों की संस्कृति निराली होती है, इतनी निराली जो शायद समाज के समझ में न आये।
आज़ादी मिलने से पहले आदिवासी अपने मूल स्वभाव में थे, यानी ब्रिटिश इंडिया से कटा-छटा। ब्रिटिश इंडिया में इनकी मूल स्थिति पर कभी प्रहार नहीं किया गया था। जंगलों से उनका रिश्ता भी शिकार तक सीमित रहा।
आज़ादी के उपलक्ष्य में जब पूरे भारत में जश्न मनाया जा रहा था तो आदिवासियों ने भी जश्न मनाया होगा। कुछ उम्मीदें भी रही होंगी , कुछ प्रत्याशाएं भी पर जैसे-जैसे समय बीतता गया उनकी उम्मीदें टूटने लगीं। सरकारों को जंगल काटने से मतलब था ,कच्चा माल लूटने से मतलब था आदिवासियों से नहीं।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने पाँव पसारे। जंगल काटे जाने लगे, पहाड़ तोड़े जाने लगे।
आदिवासियों का वनों से एकाधिकार समाप्त होता गया और लालची दुनिया जंगलों में पांव पसारती गई। आदिवासियों और वनों की सुरक्षा के लिए सरकारों ने लाख कानून बनाये, पर वे इतने प्रभावी कभी नहीं रहे जो इन्हें सुरक्षा दे सकें।
जब सभ्य समाज असभ्यों के अरण्य में जाता है तो प्रलय मचता है। सफेदपोश लोगों ने जब जंगल की ओर रुख किया तो उनके काले कारनामों से वनपुत्रियां नहीं बच सकीं। बलात्कार से लेकर वेश्यावृत्ति तक सारी कुरीतियां जंगलों में आ गयीं।आदिवासियों का व्यक्तिगत जीवन कब सार्वजनिक हुआ ये उन्हे भी नहीं पता चला।दुनिया भर के फोटोग्राफर जंगलों में पहुँच गए। आदिवासियों के अंतरंग पल दुनिया भर की मैगज़ीनों में फीचर होने लगे।
बाजारवाद की एक महत्वपूर्ण शर्त होती है कि संसाधनों का अधिकतम दोहन करो। ये दोहन चलता रहा।कभी कुछ पैसे देकर तो कभी जबरदस्ती।
आदिवासियों का दैहिक, आर्थिक और मानसिक शोषण अब तक हो रहा है।सब जानते हैं उनकी संस्कृतियां नष्ट हो रही हैं, उत्पीड़न हो रहा है। ऐसे में कुछ मौका परस्त लोगों ने उनकी असंतुष्टि को खूब भुनाया है।
वैसे भी पीड़ित लोगों को बरगलाना सबसे आसान काम होता है। सरकार के खिलाफ हथियार पकड़ा दिए गए ,कुछ ने हथियार उठा लिए , कुछ ने मूक समर्थन दे दिया। नक्सली योद्धा तैयार हो गए।
भूखे इंसान का केवल एक मज़हब होता है भूख। भर पेट खाना जो दे वही देवता अच्छा। धर्मान्तरण के सबसे ज्यादा मामले आदिवासी क्षेत्रों से आते हैं। विदेशों से संचालित ईसाई मिशनरियां ईश्वर का डर दिखा कर आदिवासियों को शिवप्रसाद से शिवा अलेक्जेंडर बनाती हैं। लालच देकर धर्म परिवर्तन।नेता जैसे चुनावी वादे करते हैं वैसे ही ये मिशनरियां समृद्धि के सपने दिखाकर धर्मान्तरण कराती हैं.
आदिवासी विसंगतियों में जीते हैं. न अस्पताल हैं, न स्कूल हैं, न रोज़गार न सर पे छत। ऐसे में सरकार से इन्हें प्यार भी कैसे हो? सरकार जब कुछ करने जाती है नक्सलियों के सरगना विकास की धज़्ज़ियाँ उड़ा देते हैं।
जंगल काटे जा रहे हैं।, जमीन छीनी जा रही है , विद्रोह तो होगा ही, आग तो सुलगनी ही है।
अमरेंद्र किशोर जी ने सरल शब्दों में आदिवासियों की व्यथा लिखी है, बरबस मन पसीज जाता है। आदिवासी महिलाओं की दशा पढ़कर वितृष्णा होने लगती है तथाकथित सभ्य समाज से। लूटने ,खसोटने के अलावा समाज कुछ नहीं समझता उन्हें।बड़े वर्गों के लिए ये महिलाएं शोषण की विषय वस्तु हैं.
लाल सलाम ठोंकने वाले कार्ल मार्क्स के उत्तराधिकारियों को ज़मीन पे उतरकर कभी जंगल की हकीकत जाननी चाहिए। राजनीती की रोटी सेंकने से अच्छा है कभी उनसे मिला जाए जिन्हें रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जिनके नाम पे राजनीति करके इनकी रातें रंगीन होती हैं कभी उनकी व्यथा महसूस करें, लेकिन कितने शर्म की बात है कि जो पूंजीवाद के सबसे बड़े विरोधी लोग हैं वही निचले तबके को पूँजी के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते, उनके साथ खड़े होने का दावा तो करते हैं पर सिर्फ दावा ही करते हैं , उनके लिए काम नहीं करते।
आप भी पढ़िए इस किताब को.ज़मीन,जंगल और रोटी को लेकर आदिवासियों अन्तर्द्वन्द्व को जानने के लिए ,शायद आप भी उस दर्द को महसूस कर सकें जिसे एक वर्ग दशकों से झेल रहा है ।
-अभिषेक शुक्ल



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 5, 2016

अत्यंत उपयोगी एवं प्रभावशाली समीक्षा लिखी है आपने अभिषेक जी । मैं स्वयं अब अमरेन्द्र जी की इस पुस्तक को शीघ्रातिशीघ्र पढ़ना चाहूंगा ।  लेख में लिखी गई आपकी प्रत्येक बात सत्य है एवं सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं है । कुछ वर्षों पूर्व आई प्रकाश झा की फ़िल्म ‘चक्रव्यूह’ में भी इसी प्रकार का यथार्थ बयान किया गया था ।

jlsingh के द्वारा
October 4, 2016

बहुत अच्छी समीक्षा लिखी है आपने अभिषेक जी! बात तो यही है की भोले भले आदिवासियों का शुरू से आजतक शोषण ही हुआ है. हर कोई अपने अपने तरीके से उन्हें सुलगाकर अपनी रोटी सेंकता है. बेचारे भोले भाले, अशिक्षित रोटी देनेवाले को ही भगवन मान बैठते हैं और उनके इशारे पर ही चलने को मजबूर भी हो जाते हैं.


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