वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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उन हाथों में बर्तन है

Posted On 30 Aug, 2016 Social Issues में

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जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों में
बर्तन है
कैसे सबका कहना मानूँ दया जगत का
दर्शन है,
कुछ सपने मैंने भी देखे थे पढ़ने और
लिखने के
अब नसीब में मेरे केवल चौका,पोंछा
बर्तन है।
कुछ उम्मीदें दुनिया से हैं कुछ अधिकार
हमें भी दे दो,
सबको तो दुलराते रहते थोड़ा प्यार
हमें भी दे दो ,
मुझे भी पढ़ना अच्छा लगता जो दुनिया
का दर्शन है ,
जिन हाथों में कलम चाहिए उन हाथों में
बर्तन है .

-अभिषेक शुक्ल

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
August 30, 2016

बहुत ही सुन्दर मार्मिक कविता अभिषेक शुक्ल जी. हालाँकि तुकांतता की दृस्टि से बर्तन और दर्शन को जानकार लोग बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं मानते फिर भी सराहनीय प्रयास है … बधाई!

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    August 31, 2016

    आभार सर. यह कविता मैंने रेडियों जिंगल प्रतियोगिता के लिए लिखा है , मेरा संस्थान एक कार्यक्रम करा रहा है हिंदी पखवाड़े के लिए..समय रहते अब सुधार कर लूंगा .


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