वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई

Posted On 25 May, 2016 Hindi Sahitya, कविता में

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तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।
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प्रीत के मन्त्र सारे धरे रह गए
गीत आंसू बने नीर से बह गए,
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।

गीत जितने लिखे सब तुम्हारे लिए
रात दिन हम तुम्हें गुनगुनाते रहे
चुप रहो मौन! हो विश्व ने यह कहा
सारे आघात सह तुमको गाते रहे
मन की पीड़ा सभी से छिपाते रहे
अश्रु मधुमय हुए पर खरे रह गए
गीत अधरों पे मेरे धरे रह गए
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।

प्रीत तुमसे लगी जग ये विस्मृत हुआ
तृप्ति मुझको मिली मन ये हर्षित हुआ,
प्रेयसी तुम समझ से परे ही रही
चेतना त्यागकर मन समर्पित हुआ
किंतु तुम तो मलय सी विचरने लगी
हम हिमालय के जैसे खड़े रह गए
कामना ने कहा,भावना ने किया
प्रीत कर हम ठगे के ठगे रह गए
हम निर्झर थे निर्झर बने रह गए,
तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई
हम जहां भी गए सब परे रह गए।।

-अभिषेक शुक्ल



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 29, 2016

बहुत ही उच्च कोटि की कविता अभिषेक जी, भाव और अभिव्यक्ति के साथ शब्दों का भी चयन भली भांति हुआ है. प्रयास जारी रहे. शुभकामनाओं के साथ!

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    July 8, 2016

    आभार सर..आपकी टिप्पणी सदैव उत्प्रेरक की भांति काम करती है. ह्रदय ताल से आपको नमन

sanmitadeo के द्वारा
May 27, 2016

बहुत अच्छी कविता लिखी आपने अभिषेक जी. … दिल को सुकून मिला पढ़ कर

Madan Mohan saxena के द्वारा
May 26, 2016

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें. आपको बधाई आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    July 8, 2016

    अवश्य सर, मैं तो आपका प्रसंशक रहा हु सदैव से..आभार.

sadguruji के द्वारा
May 25, 2016

प्रीत के मन्त्र सारे धरे रह गए, गीत आंसू बने नीर से बह गए ! आदरणीय अभिषेक शुक्ल जी ! बहुत अच्छी कविता ! बहुत बहुत बधाई !


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