वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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मेरा यार है मेरा वतन, मेरा प्यार है मेरा वतन।

Posted On: 15 Aug, 2015 कविता में

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सारे रिश्ते नाते छोड़कर
सारे कसमें वादे तोड़कर,
हम सरहदों को चल दिए
सर पे कफ़न एक ओढ़कर,
अब अलविदा! ऐ बेख़बर
किस बात का तुमको है डर?
मेरा यार है मेरा वतन!
मेरा प्यार है मेरा वतन!

बर्फीली राहों की डगर
माना कि है मुश्किल सफ़र,
तेरे इश्क़ का ऐसा असर
अब मौत से लगता न डर,
धुंधली हुई है ज़िन्दगी
पर दुश्मनों पे है नज़र,
मेरा यार है मेरा वतन!
तू प्यार है मेरा वतन!

आज़ादी की चाहत लिए
फाँसी का फन्दा चूमकर,
वंदे मातरम्! वंदे मातरम्
गाते थे जो दिल झूमकर,
वे तो शहादत को चले
मिट्टी वतन की चूमकर,
उनकी शहादत को नमन!
शान-ए-वतन! शान-ए-वतन!

तेरे इश्क़ में कुर्बान हो
हम देंगे तुझको रौशनी,
हमको शहीदों की कसम
महफूज़ होगी सरज़मीं,
ग़र हम सुपुर्द-ए-ख़ाक हों
या सरहदों पर राख हों,
रोना नहीं प्यारे वतन!
तू है खुशियों का चमन!
मेरा यार है मेरा वतन!
मेरा प्यार है मेरा वतन!
-अभिषेक शुक्ल

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