वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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झुलस रहा है देश

Posted On: 31 Jul, 2015 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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मेरे देश के नेताओं की तथाकथित धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा के नाम पर किसी भी हद तक जाकर आतंक और आतंकवाद का समर्थन कर स्वयं को उदारवादी या अहिंसक कहना, मार्क्सवाद की कुछ घटिया और बक़वास किताबें पढ़ कर ईश्वर को झूठ और देश को कुरुक्षेत्र समझने की परम्परा ने देश को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है।
धर्मनिरपेक्षता तो मेरे समझ में आज तक नहीं आयी। जिस देश ने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “विश्व बंधुत्व” का पाठ पढ़ाया वहाँ सेक्युलर होने का अद्भुत चलन चल पड़ा है। ये नेताओं की भारतीय जनता के विभाजन की ओछी नीति के अतिरक्त कुछ नहीं,लोग धर्मो में बटेंगे तो नेताओं का धंधा चलता रहेगा।
वैसे आज- कल अपने धर्म की बुराई करना ट्रेंड में है और इस काम में हिंदुओं को महारत हासिल है। मीडिया में चमकते रहेंगे जब तक अपने धर्म की निंदा करेंगे। मार्कण्डेय काटजू को तो अक्सर आप पढ़ते ही होंगे, अक्सर अपनी भड़ास निकलते रहते हैं देश और धर्म के प्रति। गौमांस खाना सेक्युलर होना है, ये उन्ही का कथन है। पता नहीं कैसे जज बन गए थे महाशय, लगता है ठीक ढंग से उन्होंने विधि दर्शन नहीं पढ़ा है।
एक हैं शशि थरूर। अपने पत्नी को पाताल पहुँचाने के बाद याकूब की फाँसी को विधिक हत्या बता रहे हैं। एक हैं दिग्विजय सिंह; इन्हें भी याकूब की फाँसी असंवैधानिक लग रही है। इनके नज़र में सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाला दरिन्दा नेक इंसान और सरकार शैतान लगती है। भारत में धर्म कहीं भी पीछा नहीं छोड़ता,यहाँ भी याकूब के समर्थकों को लगता है उसे मुसलमान होने की सजा मिली है। इस देश में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किया जाता है किन्तु कैसे इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं देता। शाहरुख़, आमिर और सलमान ख़ान शायद हिन्दू नहीं हैं। हिंदुओं ने इन्हें सुपरस्टार बना दिया, भगवान् की फ़ोटो घरों में हो न हो इनकी जरूर मिल जायेगी।
हाँ! एक ग़लती हुई है, सबने अपने-अपने घरों में याक़ूब, क़साब, अफज़ल गुरु, हाफिज सईद और मुफ़्ती के फोटोज नहीं टाँगे …इसलिए ये हिन्दू सेक्युलर नहीं हैं। जिन्होंने इन्हें आतंकवादी कहा वे सेक्युलर नहीं हैं। कट्टरवादी है।
अद्भुत प्रवित्ति के लोग रहते हैं मेरे देश में। इंसान होकर लोग नहीं सोचते, हिन्दू और मुसलमान होकर सोचते हैं। फिर एक दुसरे के लिए विषवमन करना अप्रत्याशित भी नहीं, स्वाभाविक है।
मैं सनातनधर्मी हूँ, आप कट्टर हिन्दू कह सकते हैं। मजारों पर झुकता नहीं, सूफी, मौलाना किसी के दर्शन को नहीं पढ़ा। कुरान पढ़ा है किन्तु महिलाओं पर इस्लाम की सोच से मतभेद है
पर मेरा एक बहुत क़रीबी दोस्त मुसलमान है। फोन पर बात मैं बेहद कम करता हूँ पर उससे मेरी घण्टों बात होती है। उससे बहुत सारी ऐसी बातें भी कहता हूँ जो मैं हर किसी से नहीं करता। पर इसमें मेरा धर्म कभी बीच में नहीं आया।
पूजा की अलग-अलग पद्धतियां जब दिलों को बाँटने लगें तो समझ लेना कि तुम्हारे अन्दर की इंसानियत ख़त्म हो रही है।
पर मैं तथाकथित सेक्युलर कहलाना नहीं पसंद करूँगा।
अज़ीब सी बात है न लोग जानवरों को इंसान और इंसानों को भेड़ बकरियां समझते हैं जब जी किया हलाल कर दिया। अभी पंजाब के गुरदासपुर में एक आतंकी हमला हुआ, जवान शहीद हुए, नागरिकों को जानें गईं और देश एक बार फिर रक्तरंजित हुआ। कुछ दिन बाद जब कोई आतंकी पकड़ा जायेगा तो मेरे देश के सेक्युलर और उदारवादी लोग उसे बचाने के लिए जान झोंक देंगे।
हमारे जान की कोई कीमत नहीं,कोई गद्दार आए और हमें गोलियों से छलनी कर दे फिर भी हमारे कुछ सेक्युलर मानवतावादी भारतीय उन आतंकियों लिए धरने पर बैठ जाएंगे।
कश्मीर की घाटी रोज खून से सींची जाती है। हमारे जवान शहीद होते हैं, उनकी सुरक्षा के लिए जिन्होंने कभी खुद को भारत का हिस्सा ही नहीं माना। भारतीय सेना हर आपदा में कश्मीरियों के हिफाज़त के लिए खड़ी रही पर इन्होंने अक्सर सेना पर पत्थर बरसाए। पाकिस्तान खुद को पाल नहीं सकता पर कश्मीर से दूर रहने की हमें नसीहत देता है। मार्क्सवादियों ने कितना कचरा किया है देश का ये तो जगजाहिर है। मार्क्सवाद तो शुरू होता है सरकार के साथ मतभेद से लेकिन कब नक्सलवाद में बदलते हैं इनके तरीके पता नहीं चलता। पश्चिम बंगाल, बिहार,झारखण्ड,छत्तीस गढ़, असोम सब तो नक्सलवाद की आग में जल रहे हैं। वामपंथियों को सरकार से अकारण ही समस्या होती है। सरकार के अच्छे कामों पर भी वीभत्स भर्त्सना करते हैं। वास्तव में इन्हें लोकतंत्र की संप्रभुता से समस्या होती है। इन्ही की वजह से रोज जवान मर रहे हैं निर्दोष जनता मर रही है क्या इन अमानुषों को मृत्युदण्ड देना असंवैधानिक है? अमानवीय है?
मानवाधिकार तो मानवों के लिए हैं न पिशाचों को भी ये अधिकार देना समझ से परे है।
कभी-कभी लगता है देश विभाजित है अलग-अलग मुद्दों पर। संसद में राज्य सभा हो या लोक सभा दोनों बच्चों की पाठशाला लगते हैं। राज्यसभा में तो पिछले कुछ दिनों से ऐसी हरकतें हो रहीं हैं जिन्हें देखकर शर्म आती है कि ये हैं हमारे देश के नेता। निरर्थक बहस के लिए समय है पर सरकार के साथ सार्थक विषयों पर बहस से समस्याएं हैं। ये संसद का हाल है। वामपंथी होते ही सत्ता रूढ़ सरकार दुश्मन हो जाती है। फिर देश द्वितीयक हो जाता है और अराजकता प्राथमिक।
आज मन बहुत खिन्न है। ऐसा लग रहा है कि चारो तरफ आग लगी है और मेरा देश जल रहा है। धर्म,अराजकता,नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, आतंकवाद ने घेर लिया है देश को……इसकी लपट में आम आदमी झुलस गया…मरणासन्न है…नेताओं के पास हज़ार मुद्दे हैं पर काम का एक भी नहीं…राष्ट्रीयता जैसी कोई भावना नहीं दिख रही है….कोई हिन्दू है कोई मुसलमान है पर इन्सान दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं…..दिख रही हैं आग की लपटें जिनसे इंसानियत और वतनपरस्ती झुलस रही है….



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