वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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पत्रकारिता पर सवाल

Posted On 12 May, 2015 Junction Forum, social issues में

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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चटपटी ख़बरों की स्क्रिप्ट लिखने वाले पत्रकारों से मुझे मिलना है,अगर आपका कोई जुगाड़ हो तो मुझे जरूर बताइएगा,
मुझे उनसे पूछना है की आप सब इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं? चटपटी ख़बरों और टी.आर.पी के चक्कर में किसी के सामाजिक जीवन का सत्यानाश कैसे कर लेते हैं.? क्या लिखते हैं आप?
बलात्कार की, यौन शोषण की घटनाओं का इतना जीवंत वर्णन, इतना मार्मिक रेखाचित्रण तो महादेवी वर्मा न कर पातीं जितना आप कर ले जाते हैं। भाई! दिल से बधाई के पात्र हैं आप।
पता है आपको, आपका धंधा लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। आप भी बधें हैं कानून से लेकिन इतना कानून तो अपराधी भी नहीं तोड़ते जितना की आप सब तोड़ते हैं। बड़ा नेक काम करते हैं आप।
भारतीय दंड संहिता की एक धारा है जिसका अक्सर आप लोग उल्लंघन करते हैं पढ़ लीजिये क्योंकि जानबूझ कर कानून तोड़ने में तो शिवत्व जैसा आनन्द है।
धारा है-
Section 228A in The Indian Penal Code-
Disclosure of identity of the victim
of certain offences etc.—
(1) Whoever prints or publishes the name
or any matter which may make known the
identity of any person against whom an
offence under section 376, section 376A,
section 376B, section 376C or section 376D
is alleged or found to have been committed
(hereafter in this section referred to as the
victim) shall be punished with
imprisonment of either description for a
term which may extend to two years and
shall also be liable to fine.
पर दुर्भाग्य से मिडिया पर कोई लगाम नहीं कसता क्योंकि ये अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी कह सकते हैं, कितने भी कानूनों का उल्लंघन कर सकते हैं क्योंकि पत्रकार जो ठहरे।
खैर लगाम कसे भी तो कौन भ्रष्ट नेता? उन्हें खुद लगाम की जरुरत है।
आज फेसबुक पे एक स्टेटस पढ़ा। बड़े वरिष्ठ साहित्यकार हैं, कुमार विश्वास की प्रसिद्धि के लिए उनके अवैध सम्बन्धों को वजह बता रहे थे, कल से कुछ ड्रामा चल रहा है न न्यूज़ चैनल्स पर,कुमार विश्वास को लेकर?
‘होठों पर गंगा हो हाथों में तिरंगा हो’, ‘है नमन उनको’जैसी प्रसिद्द कवितायेँ जब उन्होंने लिखा तो वो देशभक्त थे, मेहमान की तरह होली,दीपावली,दशहरा पर बुलाये जाते थे पर आज-कल तो कोई और सीन चल रहा है। कतिपय ईर्ष्यालु तथाकथित साहित्यकारों और बिकाऊ पत्रकारों ने उन्हें व्यभिचारी भी बना दिया।
शर्म आती है ऐसे साहित्य के खिलाडियों पर जो बेतुके बयान देते रहते हैं। आप साहित्य को गन्दा ही करेंगे और आपके मित्र पत्रकारिता को। शर्म आती है आपके योग्यता पर। इस लायक लिखो कि लोग आपको पसंद करें, किसी के लोकप्रिय होने पर आपत्ति क्यों?
अरे हाँ! मैं तो पत्रकारिता की बात कर रहा था,लीक से भटक गया।
भाई! आप बेशक अपने चैनल्स पर एडल्ट एंटरटेनमेंट चलायें पर उन्हें ज़रा आम खबरों से अलग रखा करें, हम विद्यार्थी हैं कभी-कभी समाचार देखना आवश्यक हो जाता है लेकिन हमें समाचार देखना होता है बलात्कार नहीं।
ऐसे मनोरंजक कार्यक्रम रात में चलाया करें 11बजे के बाद। जरूर पसंद किये जाएंगे, आपकी लोकप्रियता तो पक्का आपके घटिया सोच पर टिकी है…सोचते रहें।
बचपन से ही हमें अश्लील साहित्य से दूर रहने के निर्देश मिलते रहे हैं, बड़े हुए तो कुछ अच्छा पढ़ने की आदत हो गयी, पर मीडिया ने मस्त अश्लीलता सिखायी।
सोच रहा हूँ इस बार मनोरम कहानी, सरस सलिल, मदहोश कहानियाँ इत्यादि को सब्सक्राइब कर लूँ ये ज्ञान सफलता दिलाने में सहयोग करेंगे।
ख़ैर, अभी पैसे नहीं हैं अगली बार..
जब भी किसी कवी/साहित्यकार पर चारित्रिक आरोप लगते हैं तो मन कचोटता है।पत्रकार तो बुद्धिजीवी वर्ग में गिने जाते हैं इनसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं होती है पर अपेक्षाओं का अंत यही होता है।
कुमार विश्वास यदि केवल कवि होते तो आहत हो वानप्रस्थ रखते किंतु अब वो नेता भी हैं..थोड़े ढीट हो गए हैं..तो ये सब आम बात है उनके लिए।
यह पवित्र व्यवसाय जब से धंधा बना तबसे लोकतंत्र भी पानी मांगने लगा।
खैर,तनिक स्तरीय लिखिए मित्र!
कब तक व्यभिचार को मिर्च-मसाला लगा कर पेश करेंगे? कब तक अभिव्यक्ति के नाम पर बदतमीज़ी परोसी जायेगी?
हद है।
आप लोगों की वजह से ही अच्छे पत्रकार हाशिये पर हैं या संघर्ष कर रहे हैं। न उन्हें कोई जानता है न जान पायेगा क्योंकि भारतीय मानसिकता ही कुत्सित हो चुकी है..सच के नाम पर कितनी भी बेहूदगी करो जायज है, पर स्तरीय साहित्य या पत्रकारिता गले के नीचे नहीं उतरती।
मुंशी प्रेमचन्द्र जी ने ठीक ही कहा है- “धूर्त व्यक्ति का अपनी भावनाओं पर जो नियंत्रण होता है वह किसी सिद्ध योगी के लिए भी कठिन है।”
धूर्त नहीं जानता किसे कहते हैं पर शायद आप लोगों से उनकी शक्लें मिलती होंगी।



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