वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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अनोखा चित्रकार

Posted On: 7 Apr, 2015 Hindi Sahitya में

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प्रकृति! तुझमें कितने रंग है,कितने जीवित
दृश्यों का संकलन है तेरा स्वरूप? कितनी
विविधता है तुझमें,कितना नैसर्गिक आनंद है
तेरा दर्शक बनने में।
कौन सी कूची है तेरे पास ? कहाँ से लाती है तू
इतने रंग जिन्हें गिना नहीं जा सकता….कोई
चित्रकार क्या तुझे बनाएगा…..तेरा
चित्रकार तो बैठा है किसी पर्वत पर, किसी
नाग की शैय्या पर, किसी कमल पर…जिसने
तुझे रच तो दिया….सजीव तो किया पर छिप
गया कहीं।
पर कहाँ तक बचता? उस कलाकार ने मानव
बनाया और मानव ने ढूंढ लिया अपने रचयिता
को,अभिव्यक्त किया अपनी कृतज्ञता कभी
शब्दों से तो कभी विराट कैनवास पर तो
कभी रंगमंच पर।
सोचता हूँ कि मैं चित्रकार क्यों नहीं हूँ?
क्यों नहीं उकेर पाता मैं छवि उन
कलाकृतियों की जिन पर प्रकृति मौन रही,
जो दृश्य छिपे रहे चित्रकारों से। मन कहता है
कि तूलिका उठा लूँ, खोज लूँ कोई कैनवास
विशालतम प्रकृति में।
मैं चित्रकार कभी नहीं था, मेरी
रचनात्मकता बस शब्दों तक सीमित रही
किन्तु शब्द तो स्वाभाव से ही अपूर्ण हैं। कभी
व्याकरण की तो कभी शिष्टाचार की
सीमाओं में जकड़े हुए; हलंत, प्रत्यय, उपसर्ग,
अलंकार और न जाने कितने अनिवार्य नियमों
के पालन करने को बाध्य, आडम्बरों की
दासता में तड़पते शब्द।
विधाता के कृत्या (यह कृत्य से पृथक है) को
कौन अभिव्यक्त कर सकता है चित्रकार के
अतिरिक्त? शब्द शिल्पी असहाय है इस दशा
में।
अभिव्यक्ति के लिए शब्द पर्याप्त नहीं होते,
शब्द सीमित हैं क्योंकि इन्हें मानव ने बनाया
है अपनी सूझ-बूझ से,
किन्तु कला सम्पूर्ण है, कला ईश्वर है।
प्रकृति के वे दृश्य जिन्हें शब्द जानते ही नहीं,
क्या वर्णित करेंगे?
किसी पर्वत पर कोई अभिसारिका बैठी हो
किसी किसी कल्पना में गुमसुम सी, किसी
महर्षि की ब्रम्ह से मौन वार्तालाप जहाँ न
शब्दों की आवश्यकता हो न ही अभिव्यक्ति
की, किसी माँ का वात्सल्य, या गंगा की
अविरल धरा क्या शब्दों से व्यक्त हो सकी है
कभी?
कौन शब्द शिल्पी है जो शब्दों में संवेदना भर
दे?
शब्दों की एक सीमा है न?
किन्तु
चित्रकार एक कूची उठाता है और मानवीय
कल्पना से परे शिवत्व की ऐसी छवि बनाता है
जिसे मानव पूजता है। पत्थरों को काटकर
उसमे संवेदना भरता है, निर्जीव को सजीव
बनाता है। कभी-कभी अखरता है कि मैं,
चित्रकार क्यों नहीं? कलम छोड़ कुछ सूझता
ही नहीं, न कोई दृश्य न अभिसारिका न
अभिनय, न शाश्वत कला…शब्द अपूर्ण हैं न?



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
April 11, 2015

चित्रकार एक कूची उठाता है और मानवीय कल्पना से परे शिवत्व की ऐसी छवि बनाता है जिसे मानव पूजता है। पत्थरों को काटकर उसमे संवेदना भरता है, निर्जीव को सजीव बनाता है। कभी-कभी अखरता है कि मैं, चित्रकार क्यों नहीं? कलम छोड़ कुछ सूझता ही नहीं, न कोई दृश्य न अभिसारिका न अभिनय, न शाश्वत कला…शब्द अपूर्ण हैं न? चित्रकार की बहुत खूबसूरत परिभाषा दी है आपने अभिषेक जी !

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    April 16, 2015

    आभार भैया! ये आपकी म्हणता है जो मेरे सामान्य से प्रयत्न को आप इतना मन दे रहे हैं

Madan Mohan saxena के द्वारा
April 10, 2015

सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .

Shobha के द्वारा
April 9, 2015

प्रिय अभिषेक आप लेखन में तो बहुत अच्छे हो कविता भी बहुत अच्छी लिखी हैं अंतिम पंक्तिया अभिनय न शाश्वत कला –शब्द अपूर्ण हैं न हर पंक्ति पूर्ण हैं डॉ शोभा

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    April 13, 2015

    आभार आदरणीय. आपका ब्लॉग प् आना और उत्साह बढ़ाना मेरे लिए ईश्वर के आशीर्वाद जैसा है….आपके आशीर्वचनों की अपेक्षा में आपका -abhishek


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