वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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समान सिविल संहिता:राष्ट्र की आवश्यकता

Posted On: 26 Mar, 2015 social issues में

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एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उस राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता होती है। धर्मनिरपेक्षता राज्य की ऐसी व्यवस्था का नाम है जिसमें राज्य किसी धर्म विशेष का अनुयायी नहीं होता अपितु सभी धर्मों का संरक्षक होता है। धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों को एकता के सूत्र में पिरोती है।
धर्मनिरपेक्ष संविधान की यही विशेषता होती है कि राज्य किसी भी धर्म का प्रवर्तक नहीं होता तथा राज्य किसी भी तरह का धार्मिक, सांप्रदायिक या जातीय पक्षपात नहीं करता।
संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र की धार्मिक विविधता देखते हुए ही संविधान के भाग चार में राज्य के निति निर्देशक तत्वों में एक अनिवार्य तत्त्व ‘सामान सिविल संहिता’ (अनुच्छेद 44)का प्रावधान रखा।
इस अनुच्छेद के अनुसार-” राज्य भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक सामान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।”
किन्तु कुछ मूलभूत विडंबनाओं के कारण ‘राज्य के निति निर्देशक तत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्त्व के प्रवर्तनीय होने का प्रयास महज एक स्वप्न बन कर रह गया।
सामान नागरिक संहिता, विधि के समक्ष समता की बात करता है जो अनुच्छेद चौदह में वर्णित है।
इस अनुच्छेद के अनुसार- “राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के सामान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”
यह अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों में से एक है। समता का अधिकार एवं प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रायः बहस का विषय बनते हैं जब धार्मिक कानून और सिविल कानून का टकराव होता है।
यदि देश में एक समान सिविल संहिता लागू होती तो ऐसे टकराव नहीं जन्म लेते।
समान सिविल संहिता के अंतर्गत तीन मुख्य तथ्य प्रकाश में आते हैं-
प्रथम- व्यक्तिगत विधि
(धार्मिक कानून)
द्वितीय- संपत्ति के अधिग्रहण तथा संचालन का अधिकार
तृतीय- विवाह, तलाक तथा गोद लेने की विधि।
धार्मिक आधार पर कानूनी विभेद इन्ही तीन आधारों पर होता है।
सामान्यतः भारत में हिन्दू, मुस्लिम, पारसी तथा इसाईयों के अपने-अपने व्यक्तिगत सिविल विधियां हैं जिनके आधार पर उनके पारिवारिक वाद निपटाए जाते हैं।
इस तरह कभी-कभी कानून तथा व्यक्तिगत विधियों का टकराव होता है जिससे समाज में तनाव जन्म लेता है।
एक ही देश के समान नागरिकों के लिए कानून अलग-अलग क्यों है?
उदाहरण के लिए विवाह व्यवस्था चुनते हैं।
एक मुस्लिम पुरुष चार विवाह एक समय में कर सकता है। चार विवाह करने के बाद भी उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 494 जिसमे ‘पति या पत्नी के जीवन काल में पुनः विवाह करना’ जो कि किसी अन्य धर्मावलम्बी के लिए अपराध है तथा जिसकी सजा सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा किन्तु एक मुस्लिम पर यही धारा चार विवाह तक अमान्य होगी क्योंकि ऐसा उनका धार्मिक कानून कहता है।
क्या किसी महिला के लिए यह किसी मानसिक प्रताड़ना से कम है? क्या यह उस विवाहता के प्रेम के साथ छल नहीं है? क्या धर्म के नाम पर ऐसी कुप्रथा एक गणतांत्रिक राष्ट्र में उचित है जिसे कानून की मान्यता प्राप्त हो।
एक व्यक्ति के लिए एक कृत्य अपराध की श्रेणी में है और दूसरे व्यक्ति के लिए वही कृत्य अपराध नहीं है, यह कैसी विधि के समक्ष समता है?
हिन्दू विधि तथा सामान नागरिक संहिता-
एक दौर ऐसा चला था जब बड़ी संख्या में लोग इस्लाम धर्म ग्रहण कर रहे थे। वजह सिर्फ इतनी ही थी कि बहु विवाह करने पर भी न्यायिक प्रक्रिया से मुक्त रहें।
सरला मुद्गल बनाम भारत संघ(ए.आई.आर 1995) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को देश की एकता और धार्मिक सहिष्णुता के लिए सामान नागरिक संहिता को प्रवर्तनीय करने का निर्देश दिया तथा अगस्त 1995 में विधि एवं न्याय मंत्रालय के सचिव को सरकार के रुख को लेकर रिपोर्ट मांगी किन्तु परिणाम वही ढ़ाक के तीन पात।
किसी फैसले के पूर्व ही तत्कालीन प्रधानमंत्री ने एक मुस्लिम उलेमा से कहा कि- आप चिंता न करें। समान सिविल संहिता कभी लागू नहीं होगी।
इस वाद के बाद एक के बाद एक अनुच्छेद 32 के अंतर्गत चार याचिकाएं दर्ज की गईं। पहली याचिका महिलाओं के सामाजिक कल्याण के लिए काम करने वाली एक रजिस्टर्ड सोसाइटी द्वारा लोकहित वाद के रूप में दायर की गयी। दूसरी,तीसरी और चौथी क्रमशः मीना माथुर, गीत रानी तथा सुष्मिता घोष ने दायर किया। उक्त वादों में एक बात आम थी।एक सवाल था कि पति द्वारा धर्मपरिवर्तन कर लेने मात्र से विवाह विच्छेद पूर्ण हो जाता है?
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि- केवल धर्म परिवर्तन कर लेने मात्र से विवाह विच्छेद पूर्ण नहीं होता, जब तक की विवाह विच्छेद की डिक्री उपयुक्त न्यायलय द्वारा घोषित न कर दिया जाए।
अर्थात हिन्दू धर्म में विवाह विच्छेद केवल धर्मपरिवर्तन कर लेने से नहीं होता, ऐसा तब हो सकता है जब न्यायलय ने विवाह विच्छेद डिक्री पारित की हो।
एक समान नागरिक संहिता ऐसे कृत्यों को समाज में पनपने से रोकने में सहायक होगी। हिन्दू विधि का संहिताकरण हो चुका है तथा हिंदुओं को सामान नागरिक संहिता से आपत्ति नहीं है।
ईसाई धार्मिक विधि तथा समान नागरिक संहिता-
जॉन वल्लमत्तोम बनाम भारत संघ(ए.आई.आर 2003) वाद में एक इसाई धर्मगुरु ने उत्तराधिकार अधिनियम,1925 की धारा 118 के क़ानूनी मान्यता को इस आधार पर चुनौती दी कि यह विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद-14) का उल्लंघन करता है तथा यह धारा विधि के विरुद्ध एवं असंवैधानिक है।
धारा 118, एक व्यक्ति जिसका कोई भतीजा या भतीजी या रक्त संबंधी हो, उसे अपनी संपत्ति को धार्मिक उद्देश्य के लिए वसीयत द्वारा दान देने से रोकता था।
कोर्ट ने धरा 118 को असंवैधानिक घोषित किया।
समान नागरिक संहिता जनता के हित की बात करती है न की धार्मिक अधिकार छीनने की।
मुस्लिम विधि तथा समान नागरिक संहिता-
मुस्लिम विधि में आज भी महिलाओं के कल्याण के लिए संकीर्ण प्रावधान प्रचलन में हैं।
शरियत कानून के अनुसार एक तलाकशुदा महिला को पति से केवल इद्दत काल तक (जो कि नब्बे दिनों का होता है ) ही भरण-पोषण पाने का अधिकार है। इद्दत काल बीत जाने पर पत्नी, पति से भरण-पोषण के लिए मांग नहीं कर सकती।
इस नियम को लेकर तथा सिविल प्रकिया संहिता में प्रायः टकराव होता रहता है। सुप्रीम कोर्ट ने
नूर सबा खातून बनाम मो. कासिम (ए.आई.आर1997)
में निर्णय दिया कि- एक मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से तब तक भरण-पोषण ले सकती है जब तक कि बच्चे वयस्क न हो जाएं।
इस फैसले के विरोध में पूरा मुस्लिम समुदाय उतर आया और बड़ी बहस हुई।
दंड प्रक्रिया संहिता की धरा 125 में पत्नी के भरण-पोषण का प्रावधान है किन्तु यही धारा कई बार बहस का विषय बनती है। मुस्लिम अपने धार्मिक कानून और व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर छूट जाते हैं। यदि देश में एक समान नागरिक संहिता लागू होती तो मुस्लिम महिला इतनी असुरक्षित नहीं होती।
विवाह पंजीकरण सभी के लिए अनिवार्य हो- समान सिविल संहिता की दिशा में एक सशक्त कदम-
सुप्रीम कोर्ट ने सीमा बनाम अश्वनी कुमार(ए.आई.आर2006) के
ऐतिहासिक फैसले में निर्धारित किया कि विवाह का पंजीयन अनिवार्य हो तथा यह नियम सभी पर सामान रूप से लागू होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नितांत अनिवार्य था।
एक समान नागरिक संहिता यदि लागू होती है तो न केवल सभी धर्म के लोगों को लाभ मिलेगा बल्कि सदियों से सीमित अधिकारों में कैद मुस्लिम महिलाओं को जो चाह कर भी अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का विरोध नहीं कर पाती थीं, इस दशा से मुक्त हो सकेंगी तथा आधुनिक युग में समाज के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चल सकेंगी।
इस्लाम में महिलाओं को तलाक सम्बन्धी अधिकार बहुत सीमित मिले हुए हैं, वहीं मुस्लिम पति के अधिकार असीमित हैं। समान नागरिक संहिता के प्रवर्तनीय होने से नारी सशक्तिकरण होगा तथा आधुनिक युग में उत्तपीड़ित महिलाएं भी आजादी की साँस ले सकेंगी।
केंद्र सरकार को मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से परे हटकर एक समान नागरिक संहिता को प्रवर्तनीय करना चाहिए तथा सबके लिए एक समान सिविल कानून होना चाहिए।
शुरुआत में हर सार्थक परिवर्तन का विरोध होता है। एक समय के बाद जब लोग इस परिवर्तन से लाभान्वित होंगे तो स्वतः ही विरोध करना छोड़ देंगे।
कोई भी आचरण जो लोक आचरण के विरूद्ध हो तथा कुछ इस तरह से विनियमित होता हो जिससे एक वर्ग विशेष, लिंग विशेष के लिए वह आचरण अभिशाप हो तो ऐसी विधि को प्रतिबंधित करना ही श्रेयष्कर है।
नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों में एक अनिवार्य तत्त्व है किन्तु ऐसा धार्मिक आचरण जो वर्तमान समय में अनुपयुक्त हो उसे त्यागना ही उचित है।
इस युग में भी बहु-विवाह जैसी कुप्रथाओं का होना आधुनिकता के नाम पर तमाचा है, ऐसी परम्पराएँ कहीं से भी प्रसंगिक नहीं लगतीं।
केंद्र सरकार को समान नागरिक संहिता को प्रवर्तनीय कर राष्ट्र में एक सामान सिविल संहिता लागू करना चाहिए जिससे देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित हो, तथा संविधान उस उद्देश्य की ओर उन्मुख हो जिस हेतु हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बलिदान दिया।
यही भारतियों की उन महान आत्माओं के प्रति सच्ची कृतज्ञता
होगी।
जय हिन्द! वंदे मातरम्।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 31, 2015

श्री अभिशेख जी बहुत सार्थक लेख परन्तु सोच बन कर ही रह जायेगी एक समान सिविल सहिंता वोट बैंक की राजनीति कुछ भी संभव नहीं होने देती डॉ शोभा

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    April 5, 2015

    रोना तो इसी बात का है कि सरकार मुद्दों के अलावा साड़ी बात करती है। एक समान सिविल संहिता इसलिए आवश्यक है कि विधि के समक्ष समता बस एक कोरी कल्पना बनकर रह गयी है। एक लोकतान्त्रिक देश में व्यक्तिगत विधियां गले में अटकती हैं। अपराध तो अपराध है, इसके लिए भी व्यक्तिगत विधियों से न्याय मिला तो न्याय, न्याय न होकर अन्याय की श्रेणी में आएगा। जाने कब सर्कार छद्म धर्मनिरपेक्षता के लिबास से ऊपर उठेगी और देश में कोई सार्थक बदलाव आएगा।


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