वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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एक पगली लड़की

Posted On: 15 Mar, 2015 social issues,कविता,Hindi Sahitya में

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एक लड़की मैंने देखी है
जो दुनिया से अनदेखी है
दुनिया उससे अनजानी है
मेरी जानी-पहचानी है।
रहती है एक स्टेशन पर
कुछ फटे-पुराने कपड़ों में
कहते हैं सब वो ज़िंदा है
बिखरे-बिखरे से टुकड़ों में।
प्लेटफॉर्म ही घर उसका
वो चार बजे जग जाती है
न कोई संगी-साथी है
जाने किससे बतियाती है।
वो बात हवा से करती है
न जाने क्या-क्या कहती है
हाँ! एक स्टेशन पर देखा
एक पगली लड़की रहती है।
मैंने जब उसको देखा
वो डरी-सहमी सी सोयी थी
आँखें उसकी थीं बता रहीं
कई रातों से वो रोई थी।
बेडरूम नहीं है कहीं उसका
वो पुल के नीचे सोती है,
ठंढी, गर्मी या बारिश हो
वो इसी ठिकाने होती है।
वो हंसती है वो रोती है
न जाने क्या-क्या करती है
जाने किस पीड़ा में खोकर
सारी रात सिसकियाँ भरती है।
जाने किस कान्हा की वंशी
उसके कानों में बजती है
जाने किस प्रियतम की झाँकी
उसके आँखों में सजती है।
जाने किस धुन में खोकर
वो नृत्य राधा सी करती है
वो नहीं जानती कृष्ण कौन
पर बनकर मीरा भटकती है।
उसके चेहरे पर भाव मिले
उत्कण्ठा के उत्पीड़न के,
आशा न रही कोई जीने की
मन ही रूठा हो जब मन से।
है नहीं कहानी कुछ उसकी
पुरुषों की सताई नारी है
अमानुषों से भरे विश्व की
लाचारी पर वारी है।
वो पगली शोषण क्या जाने
भला-बुरा किसको माने
व्यभिचार से उसका रिश्ता क्या
जो वो व्यभिचारी को जाने?
वो मेरे देश की बेटी है
जो सहम-सहम के जीती है
हर दिन उसकी इज्जत लुटती
वो केवल पीड़ा पीती है।
हर गली में हर चौराहे पर
दामिनी दोहरायी जाती है,
बुजुर्ग बाप के कन्धों से
फिर चिता उठायी जाती है।
कुछ लोग सहानुभूति लिए
धरने पर धरना देते हैं,
गली-नुक्कड़-चौराहों पर
बैठ प्रार्थना करते हैं,
पर ये बरसाती मेंढक
कहाँ सोये से रहते हैं
जब कहीं दामिनी मरती है
ये कहाँ खोये से रहते हैं।
खुद के आँखों पर पट्टी है
कानून को अँधा कहते हैं
अपने घड़ियाली आंसू से
जज्बात का धंधा करते हैं।
जाने क्यों बार-बार मुझको
वो पगली याद आती है,
कुछ घूँट आँसुओं के पीकर
जब अपना दिल बहलाती है।
उसकी चीखों का मतलब क्या
ये दुनिया कब कुछ सुनती है
यहाँ कदम-कदम पर खतरा है
यहाँ आग सुलगती रहती है।
हर चीख़ यहाँ बेमतलब है
हर इंसान यहाँ पर पापी है,
हर लड़की पगली लड़की है
पीड़ा की आपाधापी है।



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 1, 2015

वो मेरे देश की बेटी है जो सहम-सहम के जीती है हर दिन उसकी इज्जत लुटती वो केवल पीड़ा पीती है। शुक्ल जी बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति सुन्दर रचना , सारा दर्द उबल पड़ा ..काश लोग मानवता का पाठ पढ़ें सरकार भी चेते तो आनंद और आये भ्रमर ५

yamunapathak के द्वारा
March 18, 2015

अभिषेक यह बहुत ही सही अभिव्यक्ति है कई बार सब कुछ देख कर भी हम कुछ नहीं कर PAATE . SABHAR

jlsingh के द्वारा
March 16, 2015

पर ये बरसाती मेंढक कहाँ सोये से रहते हैं जब कहीं दामिनी मरती है ये कहाँ खोये से रहते हैं। खुद के आँखों पर पट्टी है कानून को अँधा कहते हैं अपने घड़ियाली आंसू से जज्बात का धंधा करते हैं। बहुत ही सुन्दर विचरणीय मननीय…आपका अभिषेक करने को जी चाहता है शुक्ल जी!

    अभिषेक शुक्ल के द्वारा
    March 31, 2015

    आभार सर! अपने मेरे सामान्य से गीत को इतना मान दिया है इसके लिए मैं आपका ह्रदय से आभारी हूँ


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