वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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बिखरे ख़्वाब

Posted On: 5 Dec, 2014 कविता में

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कभी-कभी ख़्वाब भी
बिखरे पत्तों की
तरह होते हैं
कहीं भी-कभी भी
बहक जाते हैं
हवाओं से,
वजूद तो है
पर
बेमतलब
खोटे सिक्के की तरह
जो होता तो है
पर
चलता नहीं
पत्तों का क्या है
इकठ्ठे
हो सकते हैं
लेकिन ख़्वाब?
हों भी कैसे
इतने टुकड़ों में
टूटतें हैं
कि
आवाज तक नहीं आती.
टूटे ख़्वाब
दुखते तो हैं
पर
जोड़ने की
हिम्मत नहीं होती
जाने क्यों
खुद की
बनाई हुई
कमज़ोरी
हावी हो जाती है
खुद पर,
ख़्वाब सहेजे
नही जाते
जिंदगी कैसे
सम्भले
हम इंसानों से??



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sonam Saini के द्वारा
December 8, 2014

अभिषेक जी नमस्कार …..ख्वाब तो सहेजे नही जाते, ज़िंदगी कैसे सम्भले हम इंसानो से ….सही कहा… आपकी कविता हमेशा ही अच्छी लगती हैं,,,, लगता है जैसे अपने ही शब्द पढ़ रहे हों …nice कविता ….


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