वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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क्यों इन दिनों?

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इन दिनों जाने क्यों
खुद से दूरी बढ़ी,
मैं अलग हो गया
हर पल हर घडी;
ये फलक ये जमी,
है अधूरी सी क्यों?
ये सड़क ये गली,
सूनी सूनी सी क्यों?
मेरे हर कदम,
पड़ रहे हैं किधर,
चल जाता हु मैं
न जाता जिधर,
कोई आवाज़ हरदम
बुलाती रही,
तन्हाई में मुझको,
सताती रही,
अब मुझे मेरा रास्ता
बता दे खुदा,
मैं क्यों हो गया हूँ?
खुद से जुदा,
एक तस्वीर आँखों से
हटती नहीं,
उसे खोजता है मेरा
दिल कहीँ,
उसको देखे सदियाँ
गुज़रती गयी,
देखने कि ख्वाहिश
दबी है कहीँ,
मुझे मेरी मंजिल
दिला दे खुदा ,
आज भी क्यों है तू,
मुझसे खफा?
मिल जाए वो तो
जिंदा रहूँगा ,
कसम है खुद की,
न अब कुछ कहूँगा.
मेरी नज़रों से दूर
न जाना कभी,
मेरी मल्लिका तुम
रहना यही,
मेरी हसरत है तुम
पास आती रहो,
दूर से ही सही
मुस्कुराती रहो.



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