वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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अधूरी हसरत

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जिनके याद में
ताजमहल बना,
उनकी रूह
तो
तड़पती होगी,
संगमरमर की चट्टानों
के नीचे
जहाँ हवा भी
आने से डरती है,
वहां दो रूहें
कैसे
एक साथ रहती होंगी ?
मुमताज को
जीते जी तो
कैद होना पड़ा
कंक्रीट की मोटी दीवारों में ,
सब कुछ तो था
शायद
आजादी के अलावा ,
ख़ुशी के दो पल,
मिले हो
या
न मिले मिले हो
पर
कैद तो जिन्दगी भर मिली,
उन्हें आजाद कबूतरों को देख कर
उड़ने की चाहत तो थी ;
मगर
सल्तनत की मल्लिका
सोने के पिंजड़े में
कैद थीं .
शहंशाह ने
उन्हें समझा
एक खिलौना,
उनसे खेला
उन्हें चूमा ,
खिलौने के अलावा
कुछ और न थी
मुमताज बेगम ,
उनकी दीवानगी ही थी
कि
मौत को
अपना हमसफ़र
बना लिया;
शायद
मौत के आगोश में,
आजादी दामन थाम ले ,
शायद खुली हवा ,
और
प्रकृति के स्पर्श का
सानिध्य मिले ,
पर हसरतें कब
पूरी होती हैं ?
दफ़न हुई
तो
वहां पर भी
रूह तड़पती रह गयी

पथ्थरों नीचे

एक अधूरी टीस भारती ……….



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2013

अच्छी कबिता , सुन्दर भाव , बधाई सादर मदन कभी इधर का भी रुख करें .

    abhishek shukla के द्वारा
    October 18, 2013

    उत्साह वर्धन हेतु आभार….मैं आपके लेखों का नियमित पाठक हूँ

anshugupta के द्वारा
October 17, 2013

सुन्दर……………..


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