वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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प्रतिघात

Posted On: 4 Oct, 2013 कविता,Contest,Politics,Hindi Sahitya में

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मेरे मन में वेदना है
विस्मृत सी अर्चना है ;
आँखे ढकी हैं मेरी
मुझे विश्व देखना है.
नयनो पे है संकट
पलकें गिरी हुई हैं;
कुछ विम्ब भी न दिखता
दृष्टि बुझी- बुझी है.
संध्या भी बढ़ रही है
मुझे सूर्य रोकना है,
इस अन्धकार जग में,
नया तूर्य खोजना है.
नैराश्य की दिशा में ,
अब विश्व चल पड़ा है
नेत्र हीन होकर
बस युद्ध कर रहा है.
न मानव है कहीं पर
मानवता न शेष अब है,
आतंक के प्रहर में
भयभीत अब सब हैं.
कोई उपाय है जो
शान्ति को बचा ले?
भूले हुए पथिक को,
इक मार्ग फिर दिखा दे.
परिणाम हीन पथ पथ पर
क्यों बढ़ रहे कदम कुछ?
ये विषाक्त मानव
क्या कर रहा नहीं कुछ?
भयाक्रांत हैं दिशाएँ
किसे दर्प हो रहा है?
किन स्वार्थों से मानव
अब सर्प हो रहा है?
मानव की बस्तियों में
विषधर कहाँ से आये?
सोये हुए शिशु को
चुपके से काट खाए?
क्या सीखें हम विपद से
असमय मृत्यु मरना?
या शक्तिहीन होकर,
असहाय हो तड़पना?
बिन लड़े मरे तो,
धिक्कार हम सुनेंगे,
कायर नहीं कभी थे,
तो आज क्यों रहेंगे?
हिंसा के पुजारी
हिंसा से ही डरेंगे,
प्रतिघात वो करेंगे,
संहार हम करेंगे.
.”प्रति हिंसा हिंसा न भवति” .



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Prasneet Yadav के द्वारा
January 2, 2014

क्या बात है बहुत बहुत खूबसूरत अभिषेक :)

    abhishek shukla के द्वारा
    January 2, 2014

    धन्यवाद prasneet भाई

December 29, 2013

bahut prabhavshali roop se aapne apni hi nahi sabhi sachche hindustaniyon ke man kee bat rakhi hai .aabhar abhishek ji .

    abhishek shukla के द्वारा
    January 1, 2014

    dhanyawaad ma’am!

शुभ्रजा के द्वारा
October 9, 2013

सत्य से ओत प्रोत आपकी रचना है। खास कर “प्रतिघात वो करेँगे संहार हम करेँगे” बेहद आकर्षक लगा। धन्यवाद।

    abhishek shukla के द्वारा
    October 12, 2013

    आभार….परिस्थितियों की वेदना है जो मिटती नहीं

yatindranathchaturvedi के द्वारा
October 7, 2013

सही कहा, सादर

    abhishek shukla के द्वारा
    October 12, 2013

    धन्यवाद


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