वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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फितरत

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हम जीते हैं,
झूठे ख्वाबों के सहारे
जिन्दगी,
न कोई रास्ता
न कोई मंजिल
भटकना है,
अनजान राहों पर,
बसाना चाहते हैं,
इक नयी
दुनिया,
अपने
वजूद को मिटाकर ,
नफरत , धोका, फरेब,
घुटन सी होती है,
दुनिया को देखकर,
न वफ़ा ,
न सच्चाई,
हर तरफ,
नफरत, नफरत,
सिर्फ नफरत,
हैवानियत के आलम में,
पहचान खोती,
इंसानियत,
किश्तों में
दम तोड़ी ख्वाहिशें ,
अजीब सी बेचैनी,
जिन्दगी से
नफरत,
पर
बेपनाह मोहब्बत,
सुकून की तलाश,
पर मिलती ,
सिर्फ कशमकश,
कुछ होना

होने के जैसा है,
कैसी जिन्दगी है,
हम इंसानों की?



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sonam saini के द्वारा
September 22, 2013

अभिषेक जी नमस्कार ………………….. आज पहली बार आपकी कोई रचना पढ़ी …… बहुत ही खुबसूरत कविता लिखी है आपने ….भावनाओ से ओत प्रोत …एक सवाल हमेशा मुझे परेशान करता है कि दुनिया में इतने achhe लोग हैं तो फिर इतनी बुराइया क्यों हैं ? एक अच्छी कविता के लिए बधाई …………ऐसे ही लिखते रहे ……….

    abhishek shukla के द्वारा
    September 22, 2013

    agar achaaiyan hain to buraiyan bhi hain, hum badal sakte hai ya kahen ki mita sakte hain buraaiyon ko…bas humaari sachhai me dam honi chaahiye…..bahut bahut abhaar sonam ji….khusi hui..


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