वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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मधुकर

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मैंने देखा दिवा स्वप्न एक,
जाने कौन कहाँ से आया?
कुछ पल ही नयनों में ठहरा
फिर ओझल हो गया पराया.
कहाँ कोई यहाँ रुक पाता है?
धर्मशाला ये हृदय नहीं है,
बड़े बड़े वीर लौटें हैं
सहज तनिक भी विजय नहीं है.
मैं ठहरा एक रमता जोगी
पल पल बनता नया बसेरा
सफ़र में ही रातें कट जातीं
मेरे लिए क्या सांझ सवेरा?
जितने मधुकर दीखते जग में
सब मेरे अनुयायी हैं
जिन जिन राहों से मैं गुजरा,
सारे पथ दुखदायी हैं.
बहुत दिनों की दीर्घ यात्रा
कदम कदम पीड़ा में गुजरा,
कहाँ कहाँ मधु मैंने खोजा,
अब तो मधुवन को भी खतरा.
बहुत प्रसून मिले मझे पथ पर
भौरे किन्तु थे बहुत प्रबल,
प्रयत्नों से व्यथित हो उठा
प्रतिद्वंदी थे बहुत अटल.
आज फूलों ने मुझको घेरा,
अब मैं मधु ले आऊंगा,
कई मास कास्ट में बीते,
अब बैठे बैठे खाऊंगा.
मिल जाते सुन्दर प्रसून भी,
लगन रहे यदि पथ पर,
चाहे मैं जंगल में जाऊं,
मंडराता रहता कोई नभ पर.



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
April 15, 2013

हुत दिनों की दीर्घ यात्रा कदम कदम पीड़ा में गुजरा, कहाँ कहाँ मधु मैंने खोजा, अब तो मधुवन को भी खतरा. बहुत प्रसून मिले मझे पथ पर भौरे किन्तु थे बहुत प्रबल, प्रयत्नों से व्यथित हो उठा प्रतिद्वंदी थे बहुत अटल. सुन्दर शब्द ! स्वागत है आपका

    abhishek shukla के द्वारा
    June 20, 2013

    dhanyawaad yogi ji…

sachinkumardixitswar के द्वारा
April 12, 2013

बहुत सुन्दर पंक्तिबद्ध अभिव्यक्ति … 

    abhishek shukla के द्वारा
    June 20, 2013

    thankyou….brother


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