वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

101 Posts

251 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 14028 postid : 15

नारी.....एक वेदना

  • SocialTwist Tell-a-Friend

दिल्ली सरकार की निष्क्रियता और नपुंसकता में अधिक अंतर नहीं है, नपुंसकता व्यक्ति विशेष की समस्या होती है किन्तु सरकार ने क़ानून को ही नपुंसक बना दिया है.न्याय , इन्साफ जैसे शब्द तो मात्र कल्पनाओं में रह गए हैं, कुछ दिन पहले दामिनी कांड ने देश को झकझोरा था, कुछ दिनों तक जनता और जनता में व्याप्त नरभक्षी चुप थे पर अभी कुछ दिनों से बलात्कार का सिलसिला थम ही नहीं रहा है, इंसान इस हद तक वहशी हो गया है की मासूमों तक को नहीं छोड़ रहा है.सरकार नपुंसक और जनता में पुरुषत्व का ह्रास और व्यभिचार की अधिकता. भारत का भाग्य लिख कौन रहा है?
युग और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार कानून बनाये जाते है किन्तु यहाँ तो क़ानून वर्षों पुराना है जो वर्तमान परिवेश में अप्रासंगिक है,.कुछ और कठोर प्रावधानों की आवश्यकता है क्योंकि उन्नीसवीं शताब्दी की परिस्थितियां आज से बहुत भिन्न थीं. भारत के जितने भी नियम क़ानून हैं सारे अंग्रेजों के ज़माने के हैं उनमें संशोधन की आवश्यकता है.यह कहना अनुचित नहीं है की भारत के अधिकतर क़ानून बासी हो गए हैं उन्हें संशोधित कर कुछ कठोर क़ानून बनाने होंगे. ” जिस देश में अपराधियों के अपराध हेतु कठोर दंड न हो वह देश कभी उन्नति नहीं कर सकता.”
देश का दुर्भाग्य तो देखिये इस देश में कोई देशभक्त नेता ही वर्षों से नहीं हुआ, जो देश के लिए कुछ करना चाहता है वो कुचल दिया जाता है और उसके अवसान में देश की जनता का सबसे बड़ा हाथ होता है. अब जनता अपने लिए अच्छा नहीं सोच सकती तो जिनकी रगों में बेईमानी भरी है वो क्या देश के लिए सोचेंगे. देश को रसातल में पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान नेताओं का है.
हम नाम के गणतंत्र में रह रहे हैं, ये वास्विक गणतंत्र नहीं हो सकता क्योंकि यहाँ के विधि को नियमित और नियंत्रित करने वालों में देश भक्ति जैसी कोई भावना नहीं है. हर व्यक्ति स्वार्थी और व्यभिचारी हो गया है. व्यभिचार तो इस हद तक बढ़ गया है कि मासूम बच्चियां तक नहीं छोड़ी जा रही हैं.घिन आती है अब अपने सरकार से. समझ में ये नहीं आता की हम उसी भारत में रह रहे हैं जहाँ के कभी दर्शन और नीति विश्व के लिए अनुकर्णीय होता था?
भूल गए हैं हम अपने संस्कारों को मर्यादा को. नारी आज भी शोषण की विषय बन के रह गयी है, चाहे वो घर हो, कार्यस्थल हो या सड़क बस महिलाओं के साथ , साथ होता है तो बस दुर्व्यवहार. उनकी नियति ही बन गयी है अवहेलना.
यदि सरकार निष्क्रिय है तो नागरिकों को तो सक्रिय होना चाहिए. नारी का सम्मान तो कर सकते हैं, कैसे हम भूल जाते हैं किसी महिला पर भद्दी टिप्पणी करते समय की हमारी भी माँ, बहन और बेटी है? उन पर कोई अश्लील टिप्पणी करे तो कैसा लगेगा? जो हमारे लिए बुरी हो वो किसी और के लिए अच्छी कैसे हो सकती है? कब देंगे हम नारियों को उनका अधिकार?
हम सभ्य समाज में रहते हैं तो ये पशुवत व्यवहार क्यों? नारी भोग की विषय वस्तु नहीं है, नारी माँ है, नारी से हमारा जीवन है कभी वो हमसफ़र बन हर कदम पर साथ होती है तो कभी माँ के रूप में भगवन बन. फिर भी उसके हिस्से में ये अपमान क्यों? कुछ दिन पहले मैंने एक कविता लिखा था नारी को केंद्र में रख कर कविता कुछ यूँ है,
”दूर्वा हूँ, मै घास हूँ,
सदा से कुचली
जाती हूँ,
हर कोई कुचल के
चला जाता है,
मैँ जीवन देने वाली
हूँ ,
पर मेरा जीवन
दासता मेँ बीतता है,
कभी पति की,
कभी सास की,
लोग ताने देते हैँ,
और मै सहती हूँ,
डर से नही
मेरा स्वभाव ही ऐसा है.
कष्ट मुझे तब होता है,
जब मेरा जन्मा बेटा ही,
मुझे अपशब्द कहता है.
और मैँ बस
देखती रह जाती हूँ,
मुझे अब सहना बँद करना है,
क्योँकी सहने की एक सीमा होती है,
और उस सीमा को
पुरुष पार कर चुका है.
अब झुकी तो मिट जाऊँगी.”
यदि हमे अपने पुरुषत्व पर इतना अहंकार है तो नारी से भय कैसा? हम उन्हें उनका अधिकार तो दे सकते हैं. कब तक संकीर्ण विचार धाराओं में सिमटे रहेंगे?



Tags:                             

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    abhishek shukla के द्वारा
    March 16, 2013

    बहुत बहुत धन्यवाद , सकारात्मक टिप्पड़ी हेतु

bhagwanbabu के द्वारा
March 15, 2013

अच्छा लिखा है…. एक बार इसे पढ़्कर कुछ बताए… कुछ अलग है इसलिए कह रहा हूँ http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/03/10/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A4%BC%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AB%E0%A4%BC-jagran-junction-forum/

    abhishek shukla के द्वारा
    March 16, 2013

    धन्यवाद भगवान् जी।वर्तमान देख कर भविष्य से भय लगता है, बहुत सही लिखा है आपने, किन्तु कहीं कहीं परिस्थितियां इससे बहुत भिन्न होती हैं

आर.एन. शाही के द्वारा
March 15, 2013

शुक्ल जी बड़े क़ायदे से समझाने का प्रयास किया है, बधाई ! हम, आप, लोग, सब भागे जा रहे हैं, पर पता नहीं किसी को कि किस रास्ते पर । बस भागे जा रहे हैं । रास्ते में जो मिल जाता है, खा लेते हैं । जब कंठ सूख कर गड़ने लगता है, तब होश आता है कि पता नहीं कब से बड़े ज़ोरों की प्यास लगी है । सामने जैसा भी पानी मिलता है, पी लेते हैं । मिनरल वाटर है, तो किसी भी कीमत पर उसी समय खरीदते हैं । कुछ नहीं, तो कोल्ड ड्रिंक चलेगा कोई सा भी । वह भी नहीं, तो बीयर से ही बुझा लेते हैं । सेक्स की प्यास बुझाने के मामले में भी कुछ ऐसा ही पागलपन सवार होता जा रहा है । अब अभिसार की कोई भावना नहीं रही, मर चुकी है । बस सूखी प्यास है आदमज़ात, जिसे किसी तरह बुझा लेना है बस । जब भावनाएं पैदा ही नहीं हो पातीं, तो ऊँच-नीच, बच्ची-वयस्क, या रिश्ते-नातों का भेद भी मिटना ही है । वही हो रहा है । निरन्तर दौड़ते-हाँफ़ते कभी तो रुक कर देखना ही पड़ेगा कि क्या हम अब वास्तव में सभ्य कहे जा सकने वाले समाज का ही एक अंग हैं, या समाज ही बदल चुका है ।

    abhishek shukla के द्वारा
    March 16, 2013

    आपका बहुत बहुत आभार, आपने बहुत सही कहा। वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है इसके लिए हम पाश्चात्य दर्शन या संस्कृति को उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते, अलग बात है ये उनकी संस्कृति का अन्धानुकरण है जो मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारिक दोनों दृष्टिकोण से उचित नहीं है। दूसरों के अन्धानुकरण के प्रयास में हम अपने संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं यह कहीं से भी सुखद भविष्य की ऒर इंगित नहीं करता। जिस अवस्था में हम धर्म सीखते हैं उसमे यदि सरकार ऐसी शिक्षा दिलाएगी तो भारत और भारतीयता दोनों ढूँढने से नहीं मिलेंगे।


topic of the week



latest from jagran