वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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भटकता भारत .

Posted On: 4 Jan, 2013 Others में

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भारत, जहाँ कि संस्कृति का दंभ हम वर्षो से भारत आ रहे हैं , जहाँ की नीतियां विश्व बंधुत्व का प्रतिनिधित्व करती हैं, वहीँ जघन्यतम अपराध हो रहें हैं .
भारत की राजधनी जहाँ से पूरे देश के लिए कानून बनता है, जिसकी अवहेलना की हिम्मत किसी भी न्यायालय में नहीं है, वहां ही क़ानून का इतना लचर प्रदर्शन ?
क्या हमारी सरकार इतनी अशक्त है की अपने नागरिकों की रक्षा न कर पाए? प्रश्न अनेक हैं किंतु समाधान कहीं दूर दूर तक नहीं दिख रहा है।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य वहां के युवक होते हैं। हमारे तथाकथित भारतीय युवक पाश्चात्य संस्कारों की ओढ़नी ओढ़े हुए बैठे हैं।
जिन्हें छोड़ने की तनिक भी इच्छा इनमे नहीं है। वह युवक स्वयं को युवक कहना छोड़ दे जिसके मन में देश के लिए प्रेम नहीं है,कब तक हम अपनी गलतियों के लिए सरकार को दोषी मानेंगे?
देश में होने वाली हर घटना के जिम्मेदार हम युवक ही हैं . हमें खुद में अनुशासन लाना होगा अन्यथा हमारा देश सदियों पीछे चला जायेगा , हमे उतना भय आतंकवाद से नहीं है जितना कि अकर्मण्य भारतियों से है।
जाग उठो भारतीयों , हमारी माँ, बहनें यदि असुरक्षित रहीं तो हमारे जीवन से क्या लाभ? फिर तो हम धरती के बोझ हैं, हमें क्रांति लाना होगा। हम भारत माँ की गरिमा को और बढ़ाएंगे और फिर से भारत को विश्वगुरु बनायेंगे।
राष्ट्र कवि ने ठीक कहा है,
” जिनको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है,
वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है ”

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kpsinghorai के द्वारा
April 2, 2015

भाई अभिषेक बहुत जानदार है आपका लेख

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 1, 2015

सार्थक विचार शुक्ल जी …अकर्मण्यता सच में अभिशाप है वह परिवार , गाँव देश मुंह की ही खाता है जहां यह है ..अच्छा आलेख भ्रमर ५

Shobha के द्वारा
December 21, 2014

प्रिय अभिषेख जी ‘किसी भी देश का भविष्य वहा के नवयुवक होते है वह पाश्चात्य सभ्यता की ओढ़नी ओढ़े बैठे हैं’सटीक सोच हर बात में दम हैं डॉ शोभा

    abhishek shukla के द्वारा
    December 25, 2014

    आभार आदरणीया.

sadguruji के द्वारा
July 26, 2014

हमें खुद में अनुशासन लाना होगा अन्यथा हमारा देश सदियों पीछे चला जायेगा , हमे उतना भय आतंकवाद से नहीं है जितना कि अकर्मण्य भारतियों से है। जाग उठो भारतीयों , हमारी माँ, बहनें यदि असुरक्षित रहीं तो हमारे जीवन से क्या लाभ? फिर तो हम धरती के बोझ हैं, हमें क्रांति लाना होगा। संक्षप्त परन्तु बहुत विचारणीय लेख ! गागर में आपने सागर भर दिया है ! बधाई !

    abhishek shukla के द्वारा
    July 29, 2014

    आभार गुरु जी…आपका ब्लॉग पर आना किसी पुरस्कार से कम नहीं…

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 29, 2014

सच है अभिषेक जी जैसा नाम और ढोल पीटते हैं हम वैसा कुछ करना भी चाहिए लेकिन है उलटा ही भ्रमर ५

deepak pande के द्वारा
March 13, 2014

उम्दा लेखन युवा कि चेतना को जगाता हुआ

nishamittal के द्वारा
March 12, 2014

बढ़िया लिखा आपने अभिषेक

deepakbijnory के द्वारा
February 28, 2014

ek achcha lekh aapke vichaar bahut uttam hain aadarniya abhishek jee sadar naman

    abhishek shukla के द्वारा
    February 28, 2014

    प्रणाम सर! आपने मेरे लेख के लिए समय निकला..इसके लिए बहुत-बहुत आभार..

kavita1980 के द्वारा
February 12, 2014

जमानो बाद कुछ चिंगारी दिखी है, जवानी की कुछ आग दिखी है – वरना तो थे हम सोचा किए कि , इस देश में नौजवान सो गए क्या सारे ?   इस आग को बुझने न देना -शुभकामनाएँ

    abhishek shukla के द्वारा
    February 16, 2014

    kabhi nahi ma’am! zindgi bhar nahi bujhne nahi dunga…..

vaidya surenderpal के द्वारा
January 16, 2014

बहुत अच्छे और सार्थक विचार।

nishamittal के द्वारा
January 2, 2014

सार्थक पोस्ट

    abhishek shukla के द्वारा
    January 2, 2014

    आभार मैम, सादर नमन…

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
December 27, 2013

सार्थक पोस्ट .हार्दिक आभार

    abhishek shukla के द्वारा
    December 27, 2013

    धन्यवाद मैम!

abhishek shukla के द्वारा
January 4, 2013

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