वंदे मातरम्

''न मैं कवी हूँ न कवितायें , मुझे अब रास आती हैं , मैं इनसे दूर जाता हूँ , ये मेरे पास आती हैं, हज़ारों चाहने वाले, खड़े हैं इनकी राहों में, मगर कुछ ख़ास मुझमें है , ये मेरे साथ आती हैं।''

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अभिषेक शुक्ल


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भटकता भारत .

Posted On: 4 Jan, 2013  
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Others में

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क्या लिखूँ??

Posted On: 23 Aug, 2016  
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Social Issues में

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मन बावला है

Posted On: 2 Aug, 2016  
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Social Issues में

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देश नहीं कहता तुमसे।

Posted On: 17 Jul, 2016  
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Social Issues में

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कश्मीर क्यों ?

Posted On: 15 Jul, 2016  
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Social Issues लोकल टिकेट में

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भटक रहे हो मार्ग केशव!!

Posted On: 9 Jul, 2016  
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Social Issues में

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मानव का स्वाभाव

Posted On: 8 Jul, 2016  
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Social Issues में

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तुम जहां भी गए श्रृंखला बन गई

Posted On: 25 May, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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पीढ़ियों का टकराव

Posted On: 16 May, 2016  
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Hindi Sahitya में

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आत्ममुग्धता

Posted On: 14 Apr, 2016  
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Hindi Sahitya Junction Forum में

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नयनों से ‘अभिषेक’

Posted On: 13 Apr, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: अभिषेक शुक्ल अभिषेक शुक्ल

के द्वारा: अभिषेक शुक्ल अभिषेक शुक्ल

किसी भी पार्टी या न्यूज़ चैनल वालों के बहस का विषय गरीबी,बेरोजगारी, भूखमरी, बीमारी, भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि मोहन भागवत, आदित्यनाथ, ओवैसी या दो चार और चिरकुट नेताओं ने क्या बयान दिए, कौन भारत माँ की जय नहीं बोला , कौन बोल रहा है या कौन नहीं बोलेगा? ये बहस का विषय है. बहुत ही सुन्दर अभिषेक जी, आज ब्यर्थ के मुद्दे को ही उछाला जा रहा है. मैंने पहले भी लिखा था कन्हैया, या रोहित वेमुला को ज्यादा मीडिया दवरा या कुछ चिरकुट नेताओं दवरा ज्यादा तूल दिया गया उसका परिणाम आज हर जगह, आक्रोश, हिंसा आदि की बदतर स्थिति होती जा रही है. प्रत्युषा बनर्जी की एटीएम हत्या पर जितनी कवरेज हुई किसी किसान की आत्म हत्या या शहीदों को भी तरजीह नहीं दी जाती. आपका लेखन संतुलित और चिंतन करने योग्य है. अपना विचार अवश्य प्रकट करें!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: अभिषेक शुक्ल अभिषेक शुक्ल

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के द्वारा: abhishek shukla abhishek shukla

के द्वारा: pragati pragati

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वह व्यक्ति पुरुष नहीं हो सकता जो नारी पर अत्याचार होने दे या खुद करें, हैवानों से दो हाथ करो चुप मत बैठो, कहीं ऐसा न हो कि पैशाचिकता इस हद तक रक्त में समाहित हो जाए कि रक्त संबंधों में भी शुचिता का ख्याल न रहे, क्योंकि एक बार जिसके सर पर हैवानियत चढ़ती है उसे किसी रिश्ते का ख्याल नहीं होता भले ही रिश्ता चाहे माँ का हो या बहन का, हैवानियत से जंग लड़ने का वक्त है न की चुप बैठने का, इससे पहले की हर गली-मोहल्ले में दामिनी काण्ड दुहराया जाए लोगों का जागना जरूरी है..सिर्फ जागना ही नहीं है एक जुट होकर लड़ना भी है अन्यथा भारतीय संस्कृति जिसका हम दम्भ भरते हैं को ग्लानि में बदलते देर नहीं लगेगी. सहमत हूँ आपसे आपने ज्वलंत विषय उठाया है ...साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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बहुत अच्छा लिखा है तुमने अभिषेक --कहना यही है की प्रश्न तो उठाए तुमने पर जवाब नही दिये उंगली तो सब पर उठाई मगर जनता को तो कोई चाहिए --कौन ?अपनी राय नही दी --एक नारा उठा एक बार "गरीबी हटाओ"  कौन हटाएगा, कैसे हटेगी कोई जवाब नही। हटाने वाले चले गए ,गरीबी जहां की तहां है; अब अरविंद जी ले के आए हैं- भ्रष्टाचार हटाओ /हटाएँगे ---कैसे? कोई खाका है दिमाग में या वैसे ही हटाएँगे जैसे दिल्ली में हटाया है --जहां भ्रष्टाचार आपके रक्त मांस में समाया हुआ है वहाँ उस से लड़ने के हथियार बदल जाते हैं सबसे एक साथ लड़ने की ठान लोगे तो तुम्हारे साथ कौन खड़ा होगा सभी तो भ्रष्ट हैं ऊपर सत्ता के गलियारे से ले कर नीचे के सबसे छोटी पायदान पर खड़े आम आदमी तक, बीच का रास्ता निकालना नही आएगा तो उसकी परिनिति वही होगी जो हम देख चुके है;पहले भी और देश की अर्थ व्यवस्था ,सैन्य सुरक्षा ,विदेश नीतियाँ कुछ भी अब एक और नक्कारा और अक्षम प्रधान मंत्री या भगोड़े को नही झेल सकता ;थोड़े भ्रष्ट,थोड़े निरंकुश लेकिन प्रोग्रेससिव प्रधान मंत्री को जरूर झे ल सकते हैं --सहर्ष

के द्वारा: kavita1980 kavita1980

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हम पश्चिम को अकारण ही व्यभिचार और वासना का जनक कहते हैं, कम से कम वो जो करते हैं उनके जीवन का सामान्य हिस्सा है पर हम वासना और व्यभिचार ढ़ोते हैं और तर्क देते हैं अपने गौरव शाली अतीत का, जिन्हें हम कब का रौंद चुके हैं. २१ साल कि युवती हो या ५ साल कि छोटी बच्ची, हमारे यहाँ कोई सुरक्षित नहीं है. हम कितने गर्व से कहते हैं कि सबसे पुरानी सभ्यता हमारी है, ये क्यों नहीं कहते कि वो पुरानी सभ्यता अब असभ्यता में बदल गयी है, कोई थोडा भी जागरूक विदेशी हो तो हमसे यही कहेगा कि तुम उसी भारत के हो जहाँ बलात्कार नियमित होते हैं और जनता तमाशा देखती है, और बलात्कार होने के बाद सरकार पर गुस्सा जाहिर करती है, पर बदलाव का कोई वादा नहीं खुद से करती है. ”निकम्मी जनता-निकम्मी सरकार”. सार्थक सवाल उठाये हैं आपने अपने लेखन में

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

शुक्ल जी बड़े क़ायदे से समझाने का प्रयास किया है, बधाई ! हम, आप, लोग, सब भागे जा रहे हैं, पर पता नहीं किसी को कि किस रास्ते पर । बस भागे जा रहे हैं । रास्ते में जो मिल जाता है, खा लेते हैं । जब कंठ सूख कर गड़ने लगता है, तब होश आता है कि पता नहीं कब से बड़े ज़ोरों की प्यास लगी है । सामने जैसा भी पानी मिलता है, पी लेते हैं । मिनरल वाटर है, तो किसी भी कीमत पर उसी समय खरीदते हैं । कुछ नहीं, तो कोल्ड ड्रिंक चलेगा कोई सा भी । वह भी नहीं, तो बीयर से ही बुझा लेते हैं । सेक्स की प्यास बुझाने के मामले में भी कुछ ऐसा ही पागलपन सवार होता जा रहा है । अब अभिसार की कोई भावना नहीं रही, मर चुकी है । बस सूखी प्यास है आदमज़ात, जिसे किसी तरह बुझा लेना है बस । जब भावनाएं पैदा ही नहीं हो पातीं, तो ऊँच-नीच, बच्ची-वयस्क, या रिश्ते-नातों का भेद भी मिटना ही है । वही हो रहा है । निरन्तर दौड़ते-हाँफ़ते कभी तो रुक कर देखना ही पड़ेगा कि क्या हम अब वास्तव में सभ्य कहे जा सकने वाले समाज का ही एक अंग हैं, या समाज ही बदल चुका है ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

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